
सना तो उसका जैसे, पर्वत की गोद में,
मदमस्त लय से बहता, झरना सा लगा वो।......
खिल्ते रहे मिल्ते रहे, गुन्गुनाते रहे , कलिओ कि आसपास,
फुलो की फुल्हारी मै मदमस्त बहेते गये, और सामने खडे थे वो,
सपना तो नही था जो टुट के बीखर जाये, हकीकत की आरसी मे,
खुद को संवारते रहे , और नीहारते रहे छुपछुप के हमे वो!
-inspired by rekhaji's poem in the early mornin जयेन्द्र ०३/०३/२०११
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